सोमवार, 24 सितंबर 2012

आज दिल फिर रो रहा है.....


आज दिल फिर रो रहा है
जैसे कोई अपनों को खो रहा है

उजड़ गई हैं बस्तियां जिनकी
वो आज तिनके फिर ढो रहा है

लहूलुहान हो गया जमाना सारा
खंजर लिए वो अब भी घूम रहा है

दिल की आवाज़ गुम हो गई
ना जाने कहाँ आवाज़ हो रहा हैं

फरिश्ता समझता है वो खुद को
यहाँ इंसान इंसान को पूज रहा है

बुझती नहीं आग मिटती नहीं यादें
वो गेसुओं में फूल खोस रहा है

अश्क छुपाने की आदत थी जिन्हें
वो अश्कों से आज आँखे धो रहा है

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मेरी रचनाओं पर आपके द्वारा दिए गए प्रतिक्रिया स्वरुप एक-एक शब्द के लिए आप सबों को तहे दिल से शुक्रिया ...उपस्थिति बनायें रखें ...आभार