शनिवार, 8 दिसंबर 2012

मैंने कल चाँद देखा


मैंने कल चाँद देखा
मैंने कल पानी में चाँद देखा
बिल्कुल शांत स्थिर चाँद को
पानी में हिलते  
हिचकोले खाते देखा
फिर
सर उठाया तो
मुझे हर तरफ
चाँद ही चाँद नजर आया
ना जाने
कितने ही चाँद
हमारे यहाँ
पानी में हिचकोले खा रहे होंगे
सुना है
पानी धो डालता है
सब कुछ
बहा डालता है
कुछ भी
लेकिन चाँद को धो नहीं पाया
बहा नहीं पाया
चाँद के अस्तित्व को
मैं क्या समझूँ
चाँद अपना दाग धोने को आतुर है या
पानी अपना कर्तव्य
निर्वहन नहीं कर रही
मैं किससे पूछूँ
पानी से या फिर
पानी में हिलते चाँद से.......

13 टिप्‍पणियां:


  1. कल 10/12/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  2. नमस्ते पंकज जी ,

    आज पहली बार आपकी रचना पढ़ी मैंने. बहुत अच्छी लगी यह रचना. रचना के अंत में पानी और चाँद के बीच का अंतर्द्वंद बहुत सार्थक और सजीव लगा.

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  3. बहुत सुन्दर रचना है...
    प्यारे से भाव...

    अनु

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  4. सुंदर प्रस्तुति .....

    पानी निर्वहन कर रही की जगह केआर रहा होना चाहिए

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  5. पानी धो डालता हैं
    सब कुछ
    बहा डालता है

    एक उम्दा सोच के साथ गजब की प्रस्तुती .. : ))
    My first story-
     बेतुकी खुशियाँ

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  6. bahut sundar aur gahan abhivyakti , khub pakadaa hai aapane daag dhone ko aatur chaand aur paani kii bebasi ko
    Abhinandan !

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मेरी रचनाओं पर आपके द्वारा दिए गए प्रतिक्रिया स्वरुप एक-एक शब्द के लिए आप सबों को तहे दिल से शुक्रिया ...उपस्थिति बनायें रखें ...आभार