सोमवार, 2 मई 2016

मेरी कविताएँ ( अप्रैल 2016 )

आओ
भारत माता की जय
बोलते हैं
क्या कहा
नहीं बोलोगे
कोई बात नहीं
अपनी मां की ही जय बोल लो
क्या कहा
वो भी नहीं बोलोगे
अरे भाई राम की नहीं
रावण की ही जय बोल दो
तुम्हारे चरित्र से मेल जो खाता है
क्या कहा
कुछ भी हो जाए
नहीं बोलोगे
चलो ठीक है
कुछ भी बोलो
ताकि आग निकले मुंह से
और जल उठे फिर से
सब कुछ,,,,,
                                     ,,,,,,,,,,,,,,,,4 अप्रैल

तुम्हारा होना
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तुम्हारा नही होना
होने के समान है
सोचता हूं
तुम होती तो
अपने शब्दों को कहां बिछाता
तुम्हारी अनुपस्थिति
मेरे शब्दों के साथ उपस्थित है
ये सच है कि मैं आज हरा हूं
तो उसमें तुम्हारी हिस्सेदारी भी है
ये भी सच है
मैं तुम्हारे होने पर
क़सीदे नही पढता
और ना ही
तुम्हारी बाहों में उलझ
खुद को नामचीन कवि या शायर समझता
मैं तब भी उलझन में था और
आज भी उधेड़बुन में हूं
कि तुम्हारा होना अच्छा होता
या ना होना,,,,
                                     ,,,,,,,,,,,,,,,,,,6 अप्रैल

आप अपनी जड़ में मिट्टी
खुद डाल सकते हो
आपको बस जरूरत होगी तो
शराफत
ईमानदारी
जिंदादिली
कर्मठता से
किसी पहाड़ को हिलाने की
जहां से मिट्टी झरेगी
फिर
अपने कटे हुए हाथ से भी
सींच सकते हैं अपना पूरा परिवार
बिना किसी परिवार की जड़ हिलाए,,,,
                                      ,,,,,,,,,,,,,  9 अप्रैल

किसान
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अभी खुश है किसान
गेहूं पकने को है
जिसे बेच कर्जा चुकाएगा
जो लिए थे उसने बेटी के ब्याह पर
और गिड़गिड़ाते हुए कहा था
कुछ दे दो मालिक
इज्जत का सवाल है
फसल पकते ही सूद समेत लौटा दुंगा
मेरी बेटी भी आपकी ही बेटी हुई न सरकार
यह सुन
मालिक मंद मंद मुस्काया सोचा
सच उसकी ही बेटी है

अभी बहुत खुश है किसान
फसल कट चुका
अब बेचने की बारी है
अचानक समर्थन मूल्य के साथ
किसान के उत्साह में भी गिरावट
सस्ते कीमत पर बेचने होंगे गेहूं
मालिक अब भी मुस्का रहा
चुकाओ कैसे चुकाओगे
मैं तो एक पैसा नहीं छोड़ने वाला

अभी भी खुश है किसान
माथा पीट रहा है
किसान होने पर खुद को कोस रहा है
आत्महत्या की सोच रहा है क्योंकि
यही एक रास्ता है जो सीधी जाती है
मालिक अब मुस्का नहीं रहा
मालिक अब अपने पैसे की नहीं
किसान की दूसरी बेटी को सोच रहा है
आखिर वो भी तो,,,,,
                                           ,,,,,,,,11 अप्रैल


                     छापामारी
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गांव में एक किराना स्टोर वाला देशी शराब बेचता है । हर बार की तरह पुलिस को खबर मिलती है । छापामारी शुरू होती है
दुकानदार - कुछ नहीं है सर, कोई दुश्मनी से हमको फंसाना चाह रहा है
पुलिस - तु बकवास बंद करेगा कि लगाएं दू डंटा,
कुछ नहीं,  कुछ नहीं करता है,,,,
तलाशी खत्म होती है ।
दुकानदार के चेहरे पर खुशी दोगुनी हो जाती है
सोचता है फिर जीत गए ।
भीड़ मायुस होकर वापस लौट जाती है ।
पुलिस - बहुत थक गए जी कुछ खिलाओ
पिलाओ
दुकानदार- सर क्या लाएं, व्हीस्की या,,,,,
पुलिस - अरे लाओ ना गर्मी बहुत है

इसी के साथ छापामारी पूरी होती है,,,,,
                                     ,,,,,,,,,,,,,,,12 अप्रैल

पत्रकार की मौत पर
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क्या लिखते हो साहब !
ऐसा लगता है
सियासत आपके कलम की नोंक पर धरी हो
जिसे अगर एक बार झटक दो
सियासतदार दूर गिर धूल में मिल जाए
वाह
मैं तो मुरीद हो गया
आपके कलम की
कोई जवाब नहीं है

क्या लिखते हो साहब
ऐसा लगता है
सरस्वती ने आपको कान में कुछ विशेष
कह भेजा है
किसकी विसात जो टिक सके आपके सामने
ओह
छा गए गुरू
हर एक जुमला
काबिले तारीफ है

कल ये साहब
अखबार कार्यालय में सहकर्मी के मुंह से
अपनी प्रशंसा सुन अघाते नहीं थे
जिंदा थे
आज किसी सड़क के किनारे बीहड़ में
हमेशा के लिए सोये हुए
मरे पड़े थे,,,,,,
                                         ,,,,,,,,17 April

पृथ्वी दिवस पर
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लाओ तुम्हारी हथेली पर
तुुम्हारी सुलगती हुई पृथ्वी डाल दूं
ताकि तुम इसे थोडा़ फूंक मार
धधका सको
ताकि राख में तब्दील हो जाए यह पृथ्वी
फिर मांज सको अपने घर के बर्तन

ये लो झुलसी हुई पृथ्वी
तैयार है सज धज कर
पृथ्वी बचाओ
पृथ्वी बचाओ
कहकर महिमा मंडन प्रारंभ करो
फिर चलते चलते
थूक जाओ इसकी छाती पर

लाओ तुम्हारी बालकनी में
पृथ्वी को निचोड़ कर टांग दूं
ताकि सूखी हुई पृथ्वी को पहन
दौरा कर सको ब्रम्हाण्ड का
                                           ,,,,,,,,22 April

आप कुछ नहीं जानते
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आप कुछ नहीं जानते
मैं सब जानता हूँ
मुझे पता है
कितना दूध उतरेगा
मजदूरी करती किसी महिला की छाती से
या खून पिलाती रहेगी यूं ही
अपने दूधमुंहे को दिन भर

मुझे पता है
कोई किसान जब बैलों के संग लौटेगा
भरी दुपहरी अपनी बथान पर
तो उसके आगे
बड़ी बड़ी फांक वाली आलू की तरकारी
और जनहा रोटी ही परोसी जाएगी
जिसकी डकार आपकी नींव हिला सकती है

आप कुछ नहीं जानते
मैं सब जानता हूँ
सवा अरब की आबादी की आँखों में आप धूल नहीं झोक रहे
अपने लिए बवंडर निर्माण में लगे हैं आप

मुझे पता है
देश में मरने वालों की कमी नहीं
कभी भी
कोई भी मारा जा सकता है
आपकी आत्मा मर गई
तो कौन सी बड़ी बात
आप कुछ नहीं जानते
मैं सब जानता हूँ,,,,,,,
                                        ,,,,,,,,,,,27 April









2 टिप्‍पणियां:

  1. सभी रचनाएं बहुत प्रभावी ... लाजवाब सामयिक ....

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मेरी रचनाओं पर आपके द्वारा दिए गए प्रतिक्रिया स्वरुप एक-एक शब्द के लिए आप सबों को तहे दिल से शुक्रिया ...उपस्थिति बनायें रखें ...आभार