शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

माँ को मालूम नहीं है...


माँ को मालूम नहीं है
की लिख चुका हूँ
कितनी ही कविताएँ उसके नाम से,
उसे तो यह भी मालूम नहीं
की वो
मेरी कविताओं में ना होकर भी मौजूद रहती है
किसी न किसी रूप में ,
मेरी माँ खीझ उठती है
मेरी कविताओं से
कहती है –
मुझे क्या मतलब
तेरी इन कविताओं से ....
सच है
उसे कोई मतलब नहीं
मेरी कविताओं से,
लेकिन उसे तो यह भी पता नहीं
कि
मेरी कविताओं का मतलब तो सिर्फ
उसी से पूरी होती है ....|

बुधवार, 8 अगस्त 2012

आदिवासी अँधेरे में


आदिवासी तुम भी हो
वो भी हैं,
उनके यहाँ घूमते हैं
ब्रांडेड पंखे और
तुम घुमाते हो ताड़ के पंखे,
उनके यहाँ
बिजली बत्तियों की चकाचौंध है
तुम्हारे यहाँ डिबिया से तेल गुम है,
तुम उनके जनता हो और
वे तुम्हारे जनार्दन,
वे शोषण करते हैं और तुम
शोषित होते हो,
वो वोट मांगते हैं
तुम खून देते हो, और
वो बेशर्मी से तुम्हारा खून चूसते हैं
और जी भर जाने पर
तुम्हारा ही खून.
तुम्हारे
मुंह पर थूकते हैं,
तुम निर्भर हो
जंगल- झार पर
और वे जंगल काटने में लगे हैं,
तुम विरोध करते हो
उनका एक रजनीतिक मुद्दा बनता है,
कुछ खास फर्क नहीं है
‘तुझमे’ और ‘उनमे’
तुम्हारे ‘वो
कुछ दे या ना दे
सब कुछ मिलेगा,
सब कम होगा, का
आश्वासन जरुर देते हैं,
वे चैन से सोते हैं बिना किसी रुकावट के
और तुम,
लड़ते हो चैन से सोने के लिए ...                                                                  .

सोमवार, 6 अगस्त 2012

माँ... क्या हो तुम ?


माँ
क्या हो तुम..?
जेठ की चिलचिलाती धूप हो या
सावन की रिमझिम फुहार,
अनवरत बहने वाली गंगा हो या
किसी झील का शांत स्थिर जल
माँ क्या हो तुम ..?
मेरे पिता की अर्धांगिनी हो या
उनके पैर की जूती
किसी झन्नाटेदार थप्पड़ की गूंज हो या
आंचल की स्नेहिल स्पर्श
माँ क्या हो तुम...?
प्यास हो या
तृप्ति,
भूख हो या
संतुष्टि,
माँ
आखिर क्या हो तुम..?